सुबह की धूप आई, खिड़की ने मुस्कान सजाई,
चाय ने धीरे से कहा, अब दिन की बारी आई।
किताबों ने बुलाया, सपनों ने भी आवाज लगाई,
पहले पन्ना खोल लिया, फिर नींद लौटकर आई।
बूंदों ने छत पर गाया, मिट्टी ने खुशबू फैलायी,
छाता घर पर भूल गए, फिर भी शाम सुहानी छाई।
दोस्त ने पूछा हाल, मैंने हंसकर बात बताई,
थोड़ी-सी हंसी ने मेरी थकान मिटाई।